बुधवार, 15 सितंबर 2010

राहुल ·का अभियान जारी, विरोधियों पर पड़ रहे हैं भारी

कांगे्रस महासचिव राहुल गांधी ने जिस तरह से जमीनी स्तर पर उत्तर प्रदेश की कांगे्रस में जान फूंकी और पिछले लोकसभा चुनाव में बीस सालों के कांगे्रस के प्रदर्शन के मुकाबले 22 सीटों पर बेहतरीन जीत पार्टी को दिलाने में कामयाबी हासिल की और उसके बाद बिहार विधानसभा के अक्टूबर में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए राहुल गांधी ने जिस तरह से बिहार में करीब साल भर पहले युवाओं की एक बड़ी टीम को ब्लाक स्तर पर सक्रिय कर पंचायत चुनाव में जिस तरह से पार्टी को भारी जीत दिलाई उसको देखते हुए यह कहा जा सकता है कि कांगे्रस महासचिव और युवा कांगे्रस के प्रभारी राहुल गांधी बिहार में कांगे्रस को खासा मजबूत बनाने और बेहतर चुनावी नतीजे देने में पूरी तरह से सक्षम हैं।
कांगे्रस महासचिव राहुल गांधी पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में भी अपनी भूमिका को बेहतर ढंग से निभाने के लिए कमर कसे हुए हैं और इस राज्य में भी उन्होंने शुरूआती सभाओं में अपने तेवरों और सबको साथ लेकर चलने वाली सूझबूझ की राजनीति का बेहतर परिचय दिया है। कांगे्रसी हल्कों में इस बात की चर्चाएं जोरों पर हैं कि बिहार और पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों का रुख देखने के बाद कांगे्रस के युवराज राहुल गांधी को केन्द्र में महत्वपूर्ण और बड़ी जिम्मेदारी दिए जाने के लिए उनके ऊपर खासा दबाव बनाया जा सकता है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और हरियाणा प्रदेशों के अध्यक्षों का चुनाव भी होना है। इन राज्यों की समितियों ने सर्वसम्मति से प्रदेशाध्यक्षों का चुनाव करने की जिम्मेदारी पूरी तरह से कांगे्रस अध्यक्ष सोनिया गांधी के ऊपर छोड़ दी है। कांगे्रस की इस नीति के पीछे भी युवराज राहुल गांधी की सक्रियता को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। इन प्रदेशों के अध्यक्षों के चुनाव में भले ही सीधे तौर पर राहुल गांधी का कोई दखल न हो और अध्यक्षों के नामों की घोषणा कांगे्रस अध्यक्ष सोनिया गांधी ही करे, मगर राहुल गांधी का जिस भी नेता को सहयोग प्राप्त होगा उसका प्रदेशध्यक्ष बनना निश्चित है।
कांगे्रस महासचिव राहुल गांधी की भावी रणनीति को और प्रभावी बनाने के लिए कांगे्रस अध्यक्ष सोनिया गांधी के करीबी और उनके सिपाहसलार रात-दिन एक कर राहुल गांधी के लिए राष्टरीय स्तर पर महौल बनाने की कई योजनाएं और नीतियां बनाने में जुटे हैं। राहुल गांधी भी कांगे्रस पार्टी में समाज के सभी वर्गों को जोडऩे के लिए जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं पर विश्वास करते हुए कांगे्रस को बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल सहित अन्य राज्यों में मजबूत बनाने के लिए अपने दौरे और कार्यक्रम में वास्तविक कार्यकर्ताओं को तरजीह देने का काम रहे हैं। राहुल गांधी की स्वीकार्यरता और लोकप्रियता से विरोधी पार्टियों की हालत पस्त है और आम जनता राहुल गांधी के रूप में युवा नेता पाकर मस्त है।

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

मुस्लिम कौम की बहुत खिदमत कर रहे हैं 'सिराजुद्दीन कुरैशी'

हिंद ग्रुप ऑफ कंपनीज और इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर के अध्यक्ष सिराजुद्दीन कुरैशी दुनिया के उन चुनिंदा 250 उद्योगपतियों में से एक हैं जिनको अमेरिका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के साथ औद्योगिक और व्यापारिक गतिविधियों पर वाशिंगटन में आयोजित उद्योगपतियों के सम्मेलन में शिकरत करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। श्री कुरैशी की जीवनगाथा किसी फिल्मी पात्र जैसी ही प्रतीत होती है। दिल्ली नगर निगम से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त कर दिल्ली विश्व विद्यालय से कानून की शिक्षा प्राप्त करने के बाद सिराजुद्दीन कुरैशी ने राजधानी के निकट पहला मास प्रसंस्कृत प्रोजेक्ट 1979 में लगाया और हिंद ग्रु्रप ऑफ इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक बने। सिराजुद्दीन कुरैशी अपने व्यापार के साथ-साथ शुरू से ही जनसरोकार के लिए भी हर वक्त अपना सहयोग तन मन धन से देते आए हैं। श्री कुरैशी कमजोर तबकों खासतौर से मुस्लिम समुदाय के बुजुर्गों, निर्धनों और कमजोरों की सेवा में हमेशा तत्पर रहते हैं। श्री कुरैशी के व्यक्तित्व की विराटता का परिणाम यह भी है कि इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर के अध्यक्ष पद के चुनाव में इस बार केन्द्रीय अल्पसंख्यक मामले एवं कंपनी मामलों के मंत्री सलमान खुर्शीद को करारी शिकस्त दी। श्री कुरैशी के नेतृत्व में इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर की धाक दुनिया के मुस्लिम देशों के साथ-साथ अफ्रीका, मध्य पूर्व, दक्षिण-पूर्व एशिया और संयुक्त राष्ट्र अमेरिका भी जम गई है। एक उद्योगपति के साथ-साथ इस्लामिक जीवन पद्धति के पैरोकार सिराजुद्दीन कुरैशी किसी जनप्रतिनिधि से कहीं ज्यादा मानव सेवा और सामाजिक कार्यों को सरअंजाम देने में जुटे हुए हैं। उनकी इस कामयाबी के पीछे निसंदेह उन लोगों की दुआओं का भी खासा योगदान है जिन लोगों की सहायता श्री कुरैशी ने एक उद्योगपति और जनसेवक की हैसियत से की है। श्री कुरैशी से बातचीत में इस बात का भी पता चला कि वह मुस्लिम समुदाय में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए खासे फिक्रमंद हैं और अपने निजि खर्चे से शिक्षा हासिल करने वाले छात्र-छात्राओं को आर्थिक सहायता देने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं भले ही वह छात्र किसी भी धर्म, जाति या समुदाय का ही क्यों न हो।

रविवार, 5 सितंबर 2010

डीएवीपी के भ्रष्टाचार और नकारेपन का जिम्मेदार कौन अंबिका या फिर नोरोन्हा

संसद, न्यायपालिका और कार्यपालिका के साथ लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ समझे जाने वाले मीडिया की ताकत भले ही अन्य के मुकाबले ज्यादा ताकतवर दिखाई देती है मगर स्वार्थपरियता, धन लोलुपता और चाटुकारिता के साथ साथ भ्रष्टाचार ने पत्रकारिता के पवित्र पेशे को बदनाम करके रख दिया है। मीडिया दूसरों की लड़ाई लडऩे में तो कई बार बिना स्वार्थ के आगे बढ़कर संघर्ष करता हुआ प्रतीत होता है। लेकिन अपनी जायज बातों और मांगों को पूरा करवाने के लिए शायद उसके पास समय नहीं है या यूं कहे कि अपनी कमजोरियों के चलते मीडिया समुदाय अपनी लड़ाई सामूहिक रूप से लडऩे में नाकाम रहा है। यदि आप ईमानदार हैं? तो उसकी झलक आपके आचरण में प्रदर्शित भी होनी चाहिए।
भारत सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह उदार, शालीन, मृदुभावी और ईमानदार हैं। मगर उनके मंत्रिमंडल में भ्रष्टï और नकारा मंंत्रियों की भरमार है, जिनके कुकृत्यों से प्रधानमंत्री अपने आपको अलग नहीं रख सकते तब तक, जब तक ये मंत्री उनके मंत्रिमंडल की शोभा बढ़ाते रहेंगे। मिसाल के तौर पर सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों को जन-जन तक पहुंचाने की जिम्मेदारी वहन करने वाले सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले डी ए वी पी विभाग के भ्रष्टïाचार और नकारेपन को ही लें। समाचार पत्रों के विज्ञापन अनुबंधन पत्र के नवीनीकरण के मामले को ही लें। भारतवर्ष के सभी समाचार पत्रों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत डी ए वी पी विज्ञापन दर अनुबंध जारी करती है और उन्हीं समाचार पत्रों को विज्ञापन दिए जाते हैं। जो डी ए वी पी मान्यता प्राप्त हैं। डी ए वी पी पर विज्ञापन जारी करने के तरीकों पर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं, लेकिन आजतक कोई भी सूचना एवं प्रसारण मंत्री सरकार की छवि पेश करने वाले अपने इस विभाग की छवि साफ करने में कामयाब नहीं हो सका है। हमारा मतलब यह है कि न तो सरकार की नीयत साफ है और न ही इस विभाग से लाभ उठाने वाला मीडिया ईमानदार है। प्रकाशक अपने निजी स्वार्थ के चलते डी ए वी पी के अधिकारियों कर्मचारियों यहां तक कि चपरासियों तक के सामने घुटने टेकने को मजबूर हैं। कारण आर्थिक लाभ, निजी स्वार्थ और स्वयं की मजबूरी। डी ए वी पी के कर्ताधर्ता भी इन समाचार पत्रों के प्रकाशकों की कमजोरी और मजबूरी को भलिभांति जानते समझते हैं और इस विभाग का हर व्यक्ति समाज को सबक सिखाने वाले और दूसरों की लड़ाई लडऩे का दम भरने वाले पेशेवर मीडिया को अपने इशारों पर चलने को बाध्य करता है। पत्रकार की पत्रकारिता संसद, कार्यपालिका और न्यायपलिका सब जगह निर्भीकता का प्रदर्शन देते हुए चलती हैं । लेकिन सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले विभागों डी ए वी पी और आरएनआई के दफ्तर में जाते हुए बड़े बड़े मीडिया घरानेां के मालिकों और उनके प्रतिनिधियों की हवा ढीली हो जाती है। डी ए वी पी की कार्य प्रणाली और मीडिया की लाचारी का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि विज्ञापन अनुबंध पत्र के नवीनीकरण के मामले में डी ए वी पी लगातार अपनी तानाशाही का प्रदर्शन कर रहा है। ज्ञात हो कि देश भर के सभी समाचार पत्रों का विज्ञापन दर अनुबंध का नवीनीकरण बीते 1 जनवरी 2010 से होना तय था लेकिन 31.12.2009 के बाद समाचार पत्रों की पुरानी दरों को ही यथावत 31.03.2010 तक के लिए बढ़ा दिया गया, इसके लिए डी ए वी पी ने तर्क दिया कि महंगाई और समाचार पत्र में इस्तेमाल की वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोत्तरी के मद्देनजर 1 अप्रैल 2010 से नवीनीकरण के साथ समाचार पत्रों के मूल दर की भी बढ़ोत्तरी की जाएगी।
इसके बाद डी ए वी पी ने 31.03.2010 को दो लाईन का पत्र जारी करते हुए समाचार पत्रों के विज्ञापन दर अनुबंध को 1 अप्रैल 2010 से 30 जून 2010 तक फिर बढ़ा दिया। इस अवधि के पूरा होने पर डी ए वी पी ने सिर्फ दो माह के लिए एक जुलाई 2010 से 31 अगस्त 2010 तक के लिए फिर विज्ञापन दर अनुबंध के नवीनीकरण को पहले की भांति लटका दिया। समाचार पत्रों से जुड़े लोगों ने सोचा कि तीन-तीन माह के दो विस्तार के बाद डी ए वी पी ने इस बार दो माह का विस्तार किया है तो निश्चित तौर पर 1 सितम्बर 2010 को विज्ञापन दर अनुबंध पत्र का नवीनीकरण डी ए वी पी अवश्य कर देगा । लेकिन 31 अगस्त 2010 को फिर डी ए वी पी द्वारा दो लाइन का पत्र वेबसाइट पर प्रेषित किया गया। जिसके मुताबिक समाचार पत्रों का विज्ञापन दर अनुबंध 30 सितम्बर तक चौथी बार बढ़ा दिया गया।
अब सवाल यह उठता है कि डी ए वी पी पिछले आठ माह से ऐसा कौन सा काम कर रहा है जिसके चलते मामूली सी प्रक्रिया पूरी नहीं की जा सकी है। जबकि इस एक वर्ष के दौरान डी ए वी पी के पैनल पर नये समाचार पत्रों को विज्ञापन दर अनुबंध जारी करने का कई बार काम किया गया है। अब सवाल उठता है कि जिस कार्य को पहले किया जाना चाहिए था, उसको पूरा किए बगैर नये-नये कार्यों को करने की क्या वजह रही? इन नये कार्यों को करने की प्रक्रिया में कितना भ्रष्टाचार और पक्षपात हुआ इसकी अलग कहानी है।
अब सवाल उठता है कि समाचार पत्रों के प्रकाशकों के साथ ऐसा सलूक क्यों किया जा रहा है इसके कई कारण है।
मीडिया के इस धंधे में उठाईगीरे तबके का प्रवेश, प्रकाशकों के बीच एकजुटता का अभाव, निजी स्वार्थों के चलते किसी की सही बात का भी समर्थन न करना, विज्ञापन नीति को लागू करवाने के बजाए अपने स्वयं के हित के लिए इसको दर किनार करवाने में डी ए वी पी के अधिकारियों कर्मचारियों का साथ देना और सूचना प्रसारण मंत्री तथा अन्य आला अधिकारियों से भेंट कर वास्तविकता पर पर्दा डाल अपना काम निकालवाने की प्रवृत्ति।
हालांकि सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी और डी ए वी पी के महानिदेशक ए.पी. फ्रैं क नोरोन्हा बातचीत में कार्य प्रणाली को पारदर्शी, निष्पक्ष और जवाबदेह बनाने की बात कहते रहे हैं लेकिन डी ए वी पी की गतिविधियां इनके दावों की पोल खोलती हैं।

शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

टोपीबाज़ी से बाज़ आएं राहुल

सिराज साहिल
 कांगे्रस महासचिव और अमेठी से सांसद राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में कांगे्रस की वापसी के लिए जी तोड़ कोशिश में जुटे हैं। अपनी इसी रणनीति के तहत वह उत्तर प्रदेश सहित समूचे देश में रह-रह सभी धर्म जातियों और समुदायों का समर्थन हासिल करने का कोई भी मौका नहीं चूकते। लेकिन विभिन्न धर्मों और जातियों के धार्मिक और सामाजिक आयोजनों में शामिल होकर उनकी परंपरागत टोपियों को धारण कर वह मुस्लिम, सिख, हिंदू और अन्य धर्म के मानने वालों को टोनी पहनाने का काम कर रहे हैं।

राहुल गांधी उक्त समुदायों की वास्तविक समस्याओं को हल करने में पूरी तरह से नाकाम साबित हुए हैं। कांगे्रस पार्टी की तुष्टिकरण की नीतियों का ही फल है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, उत्तराखंड, पंजाब जैसे राज्यों में उसको इन धर्मों के बहुसंख्यक लोगों का समर्थन हासिल नहीं है। मुस्लिम समुदाय के तथाकथित ठेकेदार कांगे्रस पार्टी के प्रधानमंत्री पद के भावी उम्मीदवार राहुल गांधी को रोजा इफ्तार पार्टी और अन्य धार्मिक समारोहों में बुलाकर अपने निजि स्वार्थों की पूर्ति करने के सिवा कुछ भी नहीं करते। कौम को इन टोपीबाज नेताओं और उनके चाटुकारों से होशियार रहने की जरूरत है। राहुल गांधी अपनी राजनीतिक गतिविधियों में पारदर्शिता और जवाबदेही को शिद्दत के साथ प्रस्तुत करें और समाज के दबे-कुचले और वंचित लोगों को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए कार्य करें। कांगे्रस पार्टी जो कि हिंदु, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी समुदायों के बीच आपसी सौहार्द और भाईचारा बनाए रखने तथा इनको तरक्की के सामान अवसर देने की बात करती है लेकिन वास्तविक तौर पर कांगे्रस की इन बातों में कोई दम नजर नहीं आता। इसका इस बात का जीता जागता उदाहरण व्यापारिक, शैक्षणिक और आर्थिक क्षेत्र में मुस्लिम समाज की बद्तर स्थिति लगाया जा सकता है। केन्द्रीय सत्ता पर आसीन कांगे्रस पार्टी ने सच्चर समिति की रिपोर्ट तैयार कर मुस्लिम समाज की हैसियत और औकात बताकर उन्हें पहले ही खासा जलील कर दिया है। आर्थिक सहायता के नाम पर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी के साथ ही राहुल गांधी सार्वजनिक तौर पर चाहे कितना ही कहते रहें कि बैंकों से कर्ज के मामले में मुस्लिम समाज को तरजीह दी जाए। मगर आज मुसलमानों को व्यापार, शिक्षा और व्यवसाय करने के लिए बैंकों से कितनी आर्थिक सहायता प्राप्त हो रही है यह जग जाहिर है।

मुस्लिम समाज के लोगों को तथाकथित ठेकेदारों से सावधान रहते हुए कांगे्रस महासचिव राहुल गांधी की टोपीबाजी की राजनीति से सावधान रहने की जरूरत है। राहुल गांधी स्वयं उत्तर प्रदेश के अमेठी से सांसद हैं और 'टोपीबाज़ी का क्या अर्थ सामाजिक तौर पर लगाया जाता है इसका ज्ञान उनको होगा ही।

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

खेलों से पहले होगा खत्म शीला का खेल

राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों में शिथिलता और भ्रष्टïाचार के मामले में आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी को मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के मुकाबले कांगे्रस आलाकमान की तरफ से खुले तौर पर खासी फटकार पड़ी है, लेकिन कांगे्रस अध्यक्ष सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और कांगे्रस महासचिव राहुल गांधी की नजरों में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की अब वो वकत नहीं रह गई जिसके दम पर वो अब तक अपनी राजनीतिक लड़ाईयां जीतकर दिल्ली पर अपना एकछत्र राज कायम रखने में कामयाब रहीं। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चाएं हैं कि राष्ट्रमंडल खेलों के बाद मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी को दरकिनार कर दिया जाएगा। लेकिन कांगे्रस के बहुत ही विश्वस्त और करीबी सूत्रों की मानें तो मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और सुरेश कलमाड़ी को उनके पदों से पहले भी हटाए जाने का कांगे्रस आलाकमान निर्णय ले सकता है। अभी प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और कांगे्रस अध्यक्ष सोनिया गांधी भले ही सार्वजनिक तौर पर यह कहते रहे हैं कि कॉम्नवेल्थ गेम देश के गौरव का सवाल हैं और इसमें राजनीति नहीं होनी चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि इन लोगों ने मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और सुरेश कलमाड़ी के भ्रष्टाचार और नकारेपन को भुला दिया है। वैसे कांगे्रस के युवराज राहुल गांधी अपने उस वक्तव्य से भी उलझे-उलझे से हैं जिसमें उन्होंने कर्नाटक की सरकार को भ्रष्टतम सरकार की संज्ञा से नवाजा था। अब युवराज से इस बात का भी जवाब जनता चाहती है कि खुलेआम भ्रष्टचार में लिप्त दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बारे में उनका क्या ख्याल है? मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के लिए यह बात भी कम शर्मनाक नहीं है कि दिल्ली की सत्ता पर उनके आसीन रहते हुए प्रधानमंत्री को कॉम्नवेल्थ गेम की तैयारियों की निगरानी के लिए खुद मैदान में उतरना पड़ा। कांगे्रसी हल्कों में इस बात को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं कि जब शीला दीक्षित का कॉम्नवेल्थ गेम की तैयारियों में नकारापन साबित हो चुका है, तो उनको कॉम्नवेल्थ गेम जैसे अंतर्राष्ट्रीय आयोजन के समय किस आधार पर दिल्ली की मुखिया के तौर पर कांगे्रस द्वारा पेश किया जाए। इन्हीं सब बातों के मद्देनजर कांगे्रस के बड़े नेताओं के बीच में चिंतन-मनन जारी है और इस बात का ब्योरा तैयार किया जा रहा है कि राष्ट्रमंडल खेलों से पहले शीला को पद से हटाने के फैसले से कांगे्रस को क्या नफा नुकसान होगा। वैसे शीला के विरोधियों का कहना है कि निकट भविष्य में तो दिल्ली में विधानसभा चुनाव होने नहीं हैं ऐसे में शीला दीक्षित को हटाए जाने से कांगे्रस पार्टी की छवि निखरेगी ही नुकसान होने की संभावनाएं कतई नहीं। हालांकि मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने राजनीतिक गलियारों में उनके खिलाफ चल रही हवा का जायजा लेने के लिए बुधवार को अपने घर रोजा अफ्तार के बहाने मुस्लिम समुदाय के लोगों का जमावड़ा लगाकर आप करार रखने का स्वांग रच डाला, हालांकि चाटुकार, चापलूस कांगे्रसी और शीला परिक्रमा करने वाले पत्रकार उनकी कुर्सी टस से मस न होने का उन्हें आश्वासन देने से नहीं चूक रहे हैं।