रविवार, 5 सितंबर 2010

डीएवीपी के भ्रष्टाचार और नकारेपन का जिम्मेदार कौन अंबिका या फिर नोरोन्हा

संसद, न्यायपालिका और कार्यपालिका के साथ लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ समझे जाने वाले मीडिया की ताकत भले ही अन्य के मुकाबले ज्यादा ताकतवर दिखाई देती है मगर स्वार्थपरियता, धन लोलुपता और चाटुकारिता के साथ साथ भ्रष्टाचार ने पत्रकारिता के पवित्र पेशे को बदनाम करके रख दिया है। मीडिया दूसरों की लड़ाई लडऩे में तो कई बार बिना स्वार्थ के आगे बढ़कर संघर्ष करता हुआ प्रतीत होता है। लेकिन अपनी जायज बातों और मांगों को पूरा करवाने के लिए शायद उसके पास समय नहीं है या यूं कहे कि अपनी कमजोरियों के चलते मीडिया समुदाय अपनी लड़ाई सामूहिक रूप से लडऩे में नाकाम रहा है। यदि आप ईमानदार हैं? तो उसकी झलक आपके आचरण में प्रदर्शित भी होनी चाहिए।
भारत सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह उदार, शालीन, मृदुभावी और ईमानदार हैं। मगर उनके मंत्रिमंडल में भ्रष्टï और नकारा मंंत्रियों की भरमार है, जिनके कुकृत्यों से प्रधानमंत्री अपने आपको अलग नहीं रख सकते तब तक, जब तक ये मंत्री उनके मंत्रिमंडल की शोभा बढ़ाते रहेंगे। मिसाल के तौर पर सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों को जन-जन तक पहुंचाने की जिम्मेदारी वहन करने वाले सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले डी ए वी पी विभाग के भ्रष्टïाचार और नकारेपन को ही लें। समाचार पत्रों के विज्ञापन अनुबंधन पत्र के नवीनीकरण के मामले को ही लें। भारतवर्ष के सभी समाचार पत्रों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत डी ए वी पी विज्ञापन दर अनुबंध जारी करती है और उन्हीं समाचार पत्रों को विज्ञापन दिए जाते हैं। जो डी ए वी पी मान्यता प्राप्त हैं। डी ए वी पी पर विज्ञापन जारी करने के तरीकों पर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं, लेकिन आजतक कोई भी सूचना एवं प्रसारण मंत्री सरकार की छवि पेश करने वाले अपने इस विभाग की छवि साफ करने में कामयाब नहीं हो सका है। हमारा मतलब यह है कि न तो सरकार की नीयत साफ है और न ही इस विभाग से लाभ उठाने वाला मीडिया ईमानदार है। प्रकाशक अपने निजी स्वार्थ के चलते डी ए वी पी के अधिकारियों कर्मचारियों यहां तक कि चपरासियों तक के सामने घुटने टेकने को मजबूर हैं। कारण आर्थिक लाभ, निजी स्वार्थ और स्वयं की मजबूरी। डी ए वी पी के कर्ताधर्ता भी इन समाचार पत्रों के प्रकाशकों की कमजोरी और मजबूरी को भलिभांति जानते समझते हैं और इस विभाग का हर व्यक्ति समाज को सबक सिखाने वाले और दूसरों की लड़ाई लडऩे का दम भरने वाले पेशेवर मीडिया को अपने इशारों पर चलने को बाध्य करता है। पत्रकार की पत्रकारिता संसद, कार्यपालिका और न्यायपलिका सब जगह निर्भीकता का प्रदर्शन देते हुए चलती हैं । लेकिन सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले विभागों डी ए वी पी और आरएनआई के दफ्तर में जाते हुए बड़े बड़े मीडिया घरानेां के मालिकों और उनके प्रतिनिधियों की हवा ढीली हो जाती है। डी ए वी पी की कार्य प्रणाली और मीडिया की लाचारी का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि विज्ञापन अनुबंध पत्र के नवीनीकरण के मामले में डी ए वी पी लगातार अपनी तानाशाही का प्रदर्शन कर रहा है। ज्ञात हो कि देश भर के सभी समाचार पत्रों का विज्ञापन दर अनुबंध का नवीनीकरण बीते 1 जनवरी 2010 से होना तय था लेकिन 31.12.2009 के बाद समाचार पत्रों की पुरानी दरों को ही यथावत 31.03.2010 तक के लिए बढ़ा दिया गया, इसके लिए डी ए वी पी ने तर्क दिया कि महंगाई और समाचार पत्र में इस्तेमाल की वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोत्तरी के मद्देनजर 1 अप्रैल 2010 से नवीनीकरण के साथ समाचार पत्रों के मूल दर की भी बढ़ोत्तरी की जाएगी।
इसके बाद डी ए वी पी ने 31.03.2010 को दो लाईन का पत्र जारी करते हुए समाचार पत्रों के विज्ञापन दर अनुबंध को 1 अप्रैल 2010 से 30 जून 2010 तक फिर बढ़ा दिया। इस अवधि के पूरा होने पर डी ए वी पी ने सिर्फ दो माह के लिए एक जुलाई 2010 से 31 अगस्त 2010 तक के लिए फिर विज्ञापन दर अनुबंध के नवीनीकरण को पहले की भांति लटका दिया। समाचार पत्रों से जुड़े लोगों ने सोचा कि तीन-तीन माह के दो विस्तार के बाद डी ए वी पी ने इस बार दो माह का विस्तार किया है तो निश्चित तौर पर 1 सितम्बर 2010 को विज्ञापन दर अनुबंध पत्र का नवीनीकरण डी ए वी पी अवश्य कर देगा । लेकिन 31 अगस्त 2010 को फिर डी ए वी पी द्वारा दो लाइन का पत्र वेबसाइट पर प्रेषित किया गया। जिसके मुताबिक समाचार पत्रों का विज्ञापन दर अनुबंध 30 सितम्बर तक चौथी बार बढ़ा दिया गया।
अब सवाल यह उठता है कि डी ए वी पी पिछले आठ माह से ऐसा कौन सा काम कर रहा है जिसके चलते मामूली सी प्रक्रिया पूरी नहीं की जा सकी है। जबकि इस एक वर्ष के दौरान डी ए वी पी के पैनल पर नये समाचार पत्रों को विज्ञापन दर अनुबंध जारी करने का कई बार काम किया गया है। अब सवाल उठता है कि जिस कार्य को पहले किया जाना चाहिए था, उसको पूरा किए बगैर नये-नये कार्यों को करने की क्या वजह रही? इन नये कार्यों को करने की प्रक्रिया में कितना भ्रष्टाचार और पक्षपात हुआ इसकी अलग कहानी है।
अब सवाल उठता है कि समाचार पत्रों के प्रकाशकों के साथ ऐसा सलूक क्यों किया जा रहा है इसके कई कारण है।
मीडिया के इस धंधे में उठाईगीरे तबके का प्रवेश, प्रकाशकों के बीच एकजुटता का अभाव, निजी स्वार्थों के चलते किसी की सही बात का भी समर्थन न करना, विज्ञापन नीति को लागू करवाने के बजाए अपने स्वयं के हित के लिए इसको दर किनार करवाने में डी ए वी पी के अधिकारियों कर्मचारियों का साथ देना और सूचना प्रसारण मंत्री तथा अन्य आला अधिकारियों से भेंट कर वास्तविकता पर पर्दा डाल अपना काम निकालवाने की प्रवृत्ति।
हालांकि सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी और डी ए वी पी के महानिदेशक ए.पी. फ्रैं क नोरोन्हा बातचीत में कार्य प्रणाली को पारदर्शी, निष्पक्ष और जवाबदेह बनाने की बात कहते रहे हैं लेकिन डी ए वी पी की गतिविधियां इनके दावों की पोल खोलती हैं।

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